It feels good to stumble upon one's own old and lost creation....I found this poem handwritten on a piece of paper and tucked silently between the pages of an old diary. I read it and thought to imprint this in my digital diary, before it gets dissolved in the past.
Here:-
हवा के झोंको से मदमस्त हो
लहलहाता है ये पेड़,
बारिश की उन छोटी छोटी बूंदो को
अपने ही पत्तों पाकर
इतराता है ये पेड़ ।
मज़बूत तने के बल पर
विशालकाय हो खड़ा
स्वाबलंबन दर्शाता है ये पेड़ ।
अपनी असंख्य शाखाओं पर
अनगिनत पक्षियों के घरोंदे संभाले
मदद के भाव को जगाता है ये पेड़ ।
हर ऋतु के साथ बदलकर
बीतते हुए वक़्त में भी
बदलाव को बाहें खोल अपनाता है ये पेड़ ।
भंवरों की गुंजन
नव शिशु पक्षियों का क्रंदन
सभी का साया बना है ये पेड़ ।
हवा के झोंको से या
तूफानों के थपेड़े से
निस्तब्ध हो सब सहकर
सहिष्णुता का अबोध ज्ञान दे जाता है ये पेड़ ॥
Photo Credits: fotosearch.com
Here:-
हवा के झोंको से मदमस्त हो
लहलहाता है ये पेड़,
बारिश की उन छोटी छोटी बूंदो को
अपने ही पत्तों पाकर
इतराता है ये पेड़ ।मज़बूत तने के बल पर
विशालकाय हो खड़ा
स्वाबलंबन दर्शाता है ये पेड़ ।
अपनी असंख्य शाखाओं पर
अनगिनत पक्षियों के घरोंदे संभाले
मदद के भाव को जगाता है ये पेड़ ।
हर ऋतु के साथ बदलकर
बीतते हुए वक़्त में भी
बदलाव को बाहें खोल अपनाता है ये पेड़ ।
भंवरों की गुंजन
नव शिशु पक्षियों का क्रंदन
सभी का साया बना है ये पेड़ ।
हवा के झोंको से या
तूफानों के थपेड़े से
निस्तब्ध हो सब सहकर
सहिष्णुता का अबोध ज्ञान दे जाता है ये पेड़ ॥
Photo Credits: fotosearch.com
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